अध्याय 45: कम्पनी के अधीन गवर्नर जनरल — 1757 से 1805 ई.
एकीकृत, गहन अध्ययन नोट्स — BPSC, UPSC, TRE एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी।
अध्याय 45 (कम्पनी के अधीन गवर्नर जनरल: 1757 से 1805 ई.) का एकीकृत, गहन अध्ययन नोट्स (आपकी अपलोड की गई पाठ्य-सामग्री, NCERT ओल्ड + न्यू, बिहार SCERT और स्पेक्ट्रम के ऐतिहासिक आयामों सहित) प्रस्तुत है।
1. बंगाल के गवर्नर (1757–1774 ई.)
रॉबर्ट क्लाइव (1757–60 ई. एवं पुनः 1765–67 ई.)
- क्लाइव ने बक्सर के युद्ध (1764) के बाद बंगाल में द्वैध शासन लागू किया।
- दीवानी अधिकार: भू-राजस्व वसूलने, असैनिक न्याय, सैनिक संरक्षण तथा बाह्य/विदेशी मामले कंपनी के सीधे अधीन आ गए।
- निजामत (प्रशासन): शांति व्यवस्था, फौजदारी न्याय और दैनिक शासन चलाने का दायित्व नवाब के पास छोड़ा गया, किंतु उसके पास कोई स्वतंत्र वित्तीय स्रोत नहीं थे।
- संस्थागत परिणाम: "उत्तरदायित्व विहीन अधिकार (कंपनी)" और "अधिकार विहीन उत्तरदायित्व (नवाब)" का दोहरा ढांचा बना।
इलाहाबाद की संधियाँ (1765 ई.)
- मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को इलाहाबाद की पहली संधि (12 अगस्त 1765) द्वारा कंपनी के सीधे संरक्षण में ले लिया गया।
- शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी का शाही फरमान सौंपा।
- इसी संधि के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था में पहली बार आधिकारिक हस्तक्षेप का वैधानिक आधार मिला, जिससे भारत में ब्रिटिश राज की वास्तविक नींव पड़ी।
बिहार एवं बंगाल के लिए उप-दीवानों की नियुक्ति
- कंपनी सीधे राजस्व वसूली के लिए तैयार नहीं थी; अतः क्लाइव ने दो भारतीय नायब दीवान नियुक्त किए:
- बंगाल: मुहम्मद रजा खाँ।
- बिहार (SCERT/बिहार विशेष): राजा शिताब राय को बिहार का नायब दीवान नियुक्त किया गया।
- बिहार के लिए पटना में एक राजस्व परिषद (Rev. Council of Patna) भी गठित की गई।
भारतीय मानचित्रण (Cartography) की शुरुआत
- रॉबर्ट क्लाइव ने मेजर जेम्स रेनेल को हिंदुस्तान का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार करने का कार्य सौंपा।
- 1767 ई. में रेनेल ने भारत का पहला वास्तविक मानचित्र तैयार किया, जिसे 1779 ई. में प्रकाशित प्रसिद्ध 'बंगाल एटलस' (Bengal Atlas) में संकलित किया गया।
- जेम्स रेनेल को 'भारतीय भूगोल का पिता' (Father of Indian Geography) माना जाता है।
सोसाइटी फॉर ट्रेड (1765 ई.)
क्लाइव ने कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार पर रोक लगाने के लिए नमक, सुपारी और तंबाकू के व्यापार के एकाधिकार हेतु 'सोसाइटी फॉर ट्रेड' बनाई, जिसे बाद में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने रद्द कर दिया।
श्वेत विद्रोह (White Mutiny)
मुंगेर और इलाहाबाद में तैनात यूरोपीय सैन्य अधिकारियों का दोहरा भत्ता (Double Bhatta) बंद करने पर उन्होंने विद्रोह किया, जिसे क्लाइव ने कड़ाई से कुचल दिया।
संक्रमणकालीन गवर्नर
- हैरी वेरेल्स्ट (1767–69 ई.): इनके समय प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–69) समाप्त हुआ।
- जॉन कार्टियर (1769–72 ई.): इनके कार्यकाल में 1770 ई. का बंगाल का भीषण अकाल पड़ा, जिसमें बंगाल की लगभग एक-तिहाई आबादी नष्ट हो गई।
- वारेन हेस्टिंग्स (1772–74 ई. तक बंगाल के गवर्नर के रूप में): 1772 में इन्होंने बंगाल का गवर्नर पद संभाला।
2. वारेन हेस्टिंग्स (1774–1785 ई.) — भारत में कंपनी का प्रथम गवर्नर जनरल
संवैधानिक एवं प्रशासनिक परिवर्तन
रेग्युलेटिंग एक्ट (1773 ई.)
- इसके तहत 'बंगाल के गवर्नर' का पदनाम बदलकर 'बंगाल का गवर्नर जनरल' (अंग्रेजी क्षेत्रों का गवर्नर जनरल) कर दिया गया।
- इसका कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित हुआ।
- मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसियों के गवर्नरों को कूटनीतिक व युद्ध संबंधी मामलों में बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया।
- गवर्नर जनरल की सहायता के लिए 4 सदस्यीय कार्यकारी परिषद (कौंसिल — फिलिप फ्रांसिस, क्लेवरिंग, मॉनसन और बारवेल) बनाई गई।
- वारेन हेस्टिंग्स कंपनी के अधीन भारत का प्रथम गवर्नर जनरल बना। (हेस्टिंग्स 1750 ई. में एक क्लर्क के रूप में कलकत्ता आया था और कासिम बाजार का अध्यक्ष बनकर इस सर्वोच्च पद तक पहुँचा।)
द्वैध शासन का अंत (1772 ई.)
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश पर हेस्टिंग्स ने 1772 में द्वैध शासन प्रणाली को औपचारिक रूप से समाप्त किया। दोनों उप-दीवानों—मुहम्मद रजा खाँ और राजा शिताब राय—को पद से बर्खास्त कर दिया गया और कंपनी ने प्रत्यक्ष शासन का भार संभाला।
राजकीय कोषागार का स्थानांतरण
सरकारी खजाने (ट्रेजरी) को मुर्शिदाबाद से हटाकर कलकत्ता लाया गया, जिससे कलकत्ता बंगाल की वास्तविक राजधानी बन गया।
पेंशन की समाप्ति
शाह आलम द्वितीय द्वारा मराठों का संरक्षण स्वीकार करने पर हेस्टिंग्स ने मुगल सम्राट को मिलने वाली 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद करवा दी तथा इलाहाबाद व कड़ा के जिले उससे छीनकर अवध के नवाब को बेच दिए।
संरक्षक की नियुक्ति
नवाब की देखरेख के लिए मीर जाफर की विधवा मुन्नी बेगम को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया (1775 में मुन्नी बेगम को हटाकर कुछ समय के लिए रजा खाँ को पुनः दायित्व दिया गया)।
भू-राजस्व सुधार
- बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (1772 ई.): राजस्व प्रशासन की निगरानी के लिए 1772 में 'बोर्ड ऑफ रेवेन्यू' गठित किया गया।
- राय-रायन पद: लगान के संपूर्ण हिसाब-किताब के पर्यवेक्षण हेतु एक भारतीय अधिकारी 'राय-रायन' का पद सृजित किया गया। इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय दुर्लभराय के पुत्र राजा राजबल्लभ थे।
- इजारेदारी प्रथा (Quinquennial / Five-Year Settlement - 1772 ई.):
- हेस्टिंग्स ने 1772 में पंचवर्षीय ठेका प्रणाली (इजारेदारी) लागू की, जिसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम राजस्व की वसूली था।
- विशेषताएँ:
- पंचवर्षीय ठेके की व्यवस्था थी।
- नीलामी में उच्चतम बोली लगाने वाले (Highest Bidder) को लगान वसूली का ठेका दिया गया।
- विफलता: सट्टेबाजी और अत्यधिक बोली के कारण यह प्रणाली असफल रही; अतः 1777 में इसे बदलकर एकवर्षीय (Annual) ठेका प्रणाली कर दिया गया।
- मुख्य सारिस्तादार (1786 ई.): 1786 में लगान परिषद का पुनर्गठन हुआ और सभी कानूनगोओं के कागजात की जांच के लिए 'मुख्य सारिस्तादार' पद बनाया गया, जिस पर प्रथम नियुक्ति जेम्स ग्रांट की हुई।
न्यायिक पुनर्गठन
- 1772 की न्यायिक योजना: प्रत्येक जिले में दो प्रकार की अदालतें स्थापित की गईं:
- जिला दीवानी अदालत: कलेक्टर की अध्यक्षता में कार्य करती थी। इसमें व्यक्तिगत और संपत्ति संबंधी मामलों में हिंदू विधि (हिंदुओं के लिए) और मुस्लिम शरीयत (मुसलमानों के लिए) लागू होती थी।
- जिला फौजदारी अदालत: एक भारतीय अधिकारी के अधीन होती थी, जिसकी सहायता के लिए एक मुफ्ती और एक काजी होते थे। नाजिम द्वारा नियुक्त दारोगा अध्यक्षता करता था और कलेक्टर इसके कार्य की देखरेख करता था। यहाँ केवल मुस्लिम कानून लागू होता था।
अपीलीय अदालतें (कलकत्ता)
- सदर दीवानी अदालत: कलकत्ता कौंसिल का गवर्नर-जनरल और दो कौंसिल सदस्य मुख्य कानूनगो और राय-रायन की सलाह से न्याय करते थे।
- सदर निजामत/फौजदारी अदालत: नायब-नाजिम, मुख्य काजी, मुफ्ती और तीन मौलवियों की सलाह से कार्य करती थी।
कलकत्ता उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of Calcutta - 1774 ई.)
- 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत 1774 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई।
- अधिकार क्षेत्र: मूल अधिकार क्षेत्र केवल कलकत्ता शहर तक सीमित था; कलकत्ता के बाहर का मुकदमा केवल दोनों पक्षों की पूर्व सहमति से ही सुना जाता था। न्यायालय में अंग्रेजी कॉमन लॉ लागू होता था।
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर एलिजा इम्पे (Sir Elijah Impey)। (1782 में इम्पे को पद छोड़ना पड़ा।)
नंदकुमार का न्यायिक हत्याकांड (Judicial Murder - 1775 ई.)
- बंगाली ब्राह्मण राजा नंदकुमार ने हेस्टिंग्स पर मीर जाफर की विधवा मुन्नी बेगम से रिश्वत लेने का आरोप लगाया।
- हेस्टिंग्स ने मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे के साथ मिलकर नंदकुमार पर जालसाजी (Forgery) का झूठा आरोप लगवाया और अंग्रेजी कानून के तहत (जो भारत में उस समय लागू नहीं होना चाहिए था) उसे 1775 में फाँसी की सजा दिलवा दी।
शिक्षा, साहित्य एवं प्राच्यवाद (Orientalism)
- हिंदू-मुस्लिम कानूनों का संकलन:
- 1775 ई. में विभिन्न स्थानीय व्याख्याओं को समाप्त कर एकरूपता लाने के लिए 11 पंडितों को हिंदू विधियों का संकलन तैयार करने का कार्य सौंपा गया।
- 1776 ई. में एन.बी. हालहेड (N.B. Halhed) ने इसका अंग्रेजी अनुवाद 'ए कोड ऑफ जेंटू लॉज' (A Code of Gentoo Laws) के नाम से किया।
- 1778 ई. तक यूरोपीय जजों की सहायता हेतु मुस्लिम कानूनों की एक संहिता भी संकलित कर ली गई।
- कलकत्ता मदरसा (1781 ई.): हेस्टिंग्स ने फारसी एवं अरबी भाषा तथा मुस्लिम कानून के अध्ययन (प्राच्य शिक्षा) हेतु कलकत्ता में प्रथम मदरसे की स्थापना की।
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (1784 ई.): वारेन हेस्टिंग्स के संरक्षण में उसके सहयोगी सर विलियम जोंस ने प्राचीन भारतीय इतिहास, दर्शन और संस्कृति के अनुसंधान हेतु कलकत्ता में इसकी स्थापना की।
(नोट: 1804 में बंबई एशियाटिक सोसाइटी और 1823 में लंदन में 'रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन' बनी।)
- प्रमुख अनुवाद कार्य:
- चार्ल्स विल्किंस (1785 ई.): श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद किया (जिसकी भूमिका स्वयं वारेन हेस्टिंग्स ने लिखी)।
- विलियम जोंस (1789 ई.): कालिदास रचित 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' का अंग्रेजी में अनुवाद किया।
- संस्कृत कॉलेज, बनारस (1791 ई.): ब्रिटिश रेजिडेंट जोनाथन डंकन के प्रयासों से हिंदू कानून एवं दर्शन के अध्ययन हेतु बनारस में प्रथम संस्कृत कॉलेज स्थापित हुआ।
- भारत का प्रथम समाचार पत्र (1780 ई.): जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने कलकत्ता से भारत का पहला समाचार-पत्र 'द बंगाल गजट' (या कलकत्ता जनरल एडवर्टाइजर) प्रकाशित किया।
विदेश नीति, युद्ध एवं सुरक्षा प्रकोष्ठ की नीति
हेस्टिंग्स ने कंपनी के क्षेत्रों की रक्षा के लिए पड़ोसी राज्यों (विशेषकर अवध) को एक सुरक्षा बफर (मध्यवर्ती राज्य) के रूप में इस्तेमाल करने की नीति अपनाई। इसका सिद्धांत था: "अपने पड़ोसियों की सीमाओं की रक्षा करो ताकि तुम्हारी अपनी सीमाएं सुरक्षित रहें।"
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1782 ई.): 1782 में सालबाई की संधि द्वारा समाप्त हुआ (जिससे 20 वर्षों के लिए शांति स्थापित हुई)।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780–1784 ई.): 1784 में मंगलोर की संधि द्वारा समाप्त हुआ।
पिट्स इंडिया एक्ट (1784 ई.) एवं महाभियोग (Impeachment)
- पिट्स इंडिया एक्ट 1784:
- इसके द्वारा इंग्लैंड में 6 सदस्यीय 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) की स्थापना हुई, जो कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों का प्रत्यक्ष निरीक्षण करती थी।
- व्यापारिक मामलों का नियंत्रण 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' के पास रहा। इस प्रकार दोहरी सरकार (Dual Government) या 'हाफ-लॉफ सिस्टम' लागू हुआ।
- महाभियोग: पिट्स इंडिया एक्ट के विरोध में तथा कौंसिल से मतभेदों के कारण इस्तीफा देकर हेस्टिंग्स फरवरी 1785 में इंग्लैंड लौटा। ब्रिटिश सांसद एडमंड बर्क ने उस पर मनमानी, रोहिल्ला युद्ध, बनारस के राजा चेत सिंह के उत्पीड़न और अवध की बेगमों के खजाने की लूट के आरोप में हाउस ऑफ कॉमन्स में महाभियोग चलाया। यह मुकदमा 1788 से 1795 (7 वर्ष) तक चला, और अंततः 24 अप्रैल 1795 को हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
3. सर जॉन मैकफरसन (1785–1786 ई.)
इन्हें हेस्टिंग्स के जाने के बाद कार्यवाहक/अस्थायी गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया था।
4. लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793 ई. एवं पुनः 1805 ई.)
प्रशासनिक एवं नागरिक सेवा सुधार
- भारत में नागरिक सेवा (Civil Services) का जनक: कॉर्नवालिस को भारत में सिविल सेवा का जन्मदाता माना जाता है।
- उसने भाई-भतीजावाद समाप्त किया और वरिष्ठता (Seniority) के आधार पर पदोन्नति का नियम बनाया।
- उसने कंपनी के कर्मचारियों के व्यक्तिगत/निजी व्यापार (Private Trade) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया तथा उनके वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि की ताकि भ्रष्टाचार रुके।
- प्रशासन का यूरोपीयकरण (नस्लीय भेदभाव):
- कॉर्नवालिस का दृढ़ विश्वास था कि "एशिया का प्रत्येक मूल निवासी भ्रष्ट है।"
- उसने 500 पाउंड से अधिक वार्षिक वेतन वाले सभी उच्च प्रशासनिक पदों से भारतीयों को बाहर कर दिया।
- भारतीयों के लिए पदोन्नति की सीमाएं तय कर दी गईं:
- सेना में: अधिकतम पद 'सूबेदार' या 'जमादार'।
- प्रशासनिक/न्यायिक सेवा में: मुंसिफ, सदर अमीन या नायब/डिप्टी कलेक्टर से ऊंचा पद नहीं दिया जाता था।
कॉर्नवालिस कोड (Cornwallis Code - 1793 ई.) एवं न्यायिक पुनर्गठन
- शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers): प्रसिद्ध 'कॉर्नवालिस कोड' शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित था।
- कलेक्टर की शक्तियों में कमी: 1793 के विनियम द्वारा जिला कलेक्टर को उसकी न्यायिक एवं दंडात्मक शक्तियों से वंचित कर दिया गया और उसे केवल कर/राजस्व संग्राहक (Collector) तक सीमित कर दिया गया। जिले में न्याय के लिए एक पृथक 'जिला एवं सत्र न्यायाधीश' (District Judge) नियुक्त किया गया।
- अदालतों का पुनर्गठन:
- भारतीय अधिकारियों से युक्त पुरानी जिला फौजदारी अदालतों को समाप्त कर दिया गया।
- इनके स्थान पर चार प्रांतीय भ्रमणशील अदालतें (Circuit Courts) स्थापित की गईं, जिनमें यूरोपीय जज बैठते थे:
- 3 अदालतें: बंगाल (कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका)।
- 1 अदालत (बिहार विशेष): पटना में स्थापित की गई।
पुलिस व्यवस्था का आधुनिकीकरण
- दारोगा प्रणाली (1792 ई.): कॉर्नवालिस ने भारत में एक व्यवस्थित और आधुनिक पुलिस बल की नींव रखी।
- जमींदारों का अधिकार समाप्त: ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से पुलिस अधिकार रखने वाले जमींदारों को इस अधिकार से वंचित कर दिया गया।
- थाना व्यवस्था: प्रत्येक जिले को लगभग 20 मील के क्षेत्रों में थानों में विभाजित किया गया और प्रत्येक थाने का इंचार्ज एक भारतीय अधिकारी—दारोगा—को बनाया गया। जिले का पुलिस अधीक्षक (SP) जिले की संपूर्ण कानून-व्यवस्था का प्रमुख होता था।
स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement - 1793 ई.)
- पृष्ठभूमि एवं योजनाकार: इस व्यवस्था का प्रारूप और योजना सर जॉन शोर ने तैयार की थी। इसे 22 मार्च 1793 को स्थायी कर दिया गया।
- लागू क्षेत्र: बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश के बनारस खंड, तथा मद्रास के उत्तरी जिलों में लागू किया गया (यह ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल के 19% भाग पर लागू थी)।
- प्रमुख प्रावधान:
- भूमि स्वामी: जमींदारों को भूमि का वास्तविक और वंशानुगत मालिक मान लिया गया।
- राजस्व विभाजन: जमींदार द्वारा वसूले गए कुल भू-राजस्व का लगभग 90% भाग (10/11 भाग) कंपनी को देना था, जबकि लगभग 10% भाग (1/11 भाग) जमींदार को अपने प्रशासनिक व्यय और लाभ के रूप में रखना था।
- लगान निर्धारण की स्वतंत्रता: जमींदार किसानों से मनमाना लगान तय करने के लिए स्वतंत्र थे, जिससे काश्तकारों का शोषण बढ़ा।
- सूर्यास्त का नियम (Sunset Law): सरकार को एक निश्चित तिथि के सूर्यास्त से पहले राजस्व चुकाना अनिवार्य था; ऐसा न करने पर जमींदार की भूमि/जमींदारी जब्त कर नीलाम कर दी जाती थी।
- परिणाम: इसने भारत में अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान एक नया मध्यवर्ती 'जमींदार वर्ग' तैयार किया, किंतु वास्तविक किसान अपनी ही जमीन पर अधिकारविहीन बटाईदार बनकर रह गया।
तुलनात्मक अध्ययन: ब्रिटिश भारत की प्रमुख भू-राजस्व प्रणालियाँ
| मापदंड | स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी) | रैयतवाड़ी व्यवस्था | महालवाड़ी व्यवस्था |
|---|---|---|---|
| लागू क्षेत्रफल (ब्रिटिश भारत) | 19% | 51% (सर्वाधिक) | 30% |
| प्रारंभिक क्षेत्र | बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस, उत्तरी मद्रास। | मद्रास (बारामहल), बम्बई, असम, कुर्ग। | गंगा घाटी, पश्चिमी उप्र, मध्य भारत, पंजाब। |
| प्रमुख योजनाकार | लॉर्ड कॉर्नवालिस एवं जॉन शोर। | कैप्टन अलेक्जेंडर रीड एवं थॉमस मुनरो। | होल्ट मैकेंजी एवं मार्टिन बर्ड। |
| आरंभ वर्ष | 1793 ई. | 1792 (बारामहल) / 1820 (मद्रास) | 1822 ई. (1833 में सुधार) |
| समझौता किसके साथ | जमींदार (बिचौलिया वर्ग) | सीधे किसान (रैयत) के साथ | समूचे गाँव (महाल) के मुखिया / लंबरदार के साथ। |
| लगान की दर | निश्चित (कंपनी को 10/11 भाग) | उपज का 1/3 से 1/2 भाग (नकद) | प्रारंभ में 66% (2/3), बाद में घटाकर 50%। |
| विशेष लक्षण | सूर्यास्त कानून; बिचौलियों का लाभ। | 30 वर्ष बाद दर की पुनर्समीक्षा; भूमि गिरवी/बिक्री योग्य। | मानचित्रों एवं रजिस्टरों (पंजियों) का प्रथम वैज्ञानिक प्रयोग। |
5. सर जॉन शोर (1793–1798 ई.)
- अहस्तक्षेप की नीति (Policy of Non-Intervention): इन्होंने भारतीय रियासतों के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति अपनाई।
- खारदा का युद्ध (1795 ई.): जब मराठों ने हैदराबाद के निजाम पर आक्रमण किया, तो सर जॉन शोर ने 1768 की संधि के बावजूद निजाम की कोई सहायता नहीं की, जिससे निजाम पराजित हुआ और अंग्रेजों की प्रतिष्ठा गिरी।
- 1793 का चार्टर एक्ट इन्हीं के समय पारित हुआ।
6. लॉर्ड वेलेजली (1798–1805 ई.) — सहायक संधि एवं साम्राज्य विस्तार
उपनाम: स्वयं को 'बंगाल का शेर' (Tiger of Bengal) कहता था।
सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System)
- मूल संकल्पना: भारत में सहायक संधि का पहला प्रयोग फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने किया था, किंतु वेलेजली ने इसे एक सुनियोजित साम्राज्यवादी हथियार बना दिया।
- संधि की मुख्य शर्तें:
- संबंधित भारतीय रियासत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परित्याग करेगी और अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से युद्ध या संधि नहीं करेगी।
- राज्य में एक स्थायी ब्रिटिश सेना तैनात रहेगी, जिसका खर्च रियासत नकद या अपने एक निश्चित भूभाग का राजस्व सौंपकर वहन करेगी।
- रियासत अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रखेगी और किसी भी अन्य यूरोपीय (विशेषकर फ्रांसीसी) को अंग्रेजों की अनुमति के बिना सेवा में नहीं रखेगी।
- कंपनी रियासत को आंतरिक व बाह्य सुरक्षा की गारंटी देगी तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन देगी (जिसका बाद में लगातार उल्लंघन हुआ)।
सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्यों का सही कालक्रम (अत्यंत महत्वपूर्ण)
- हैदराबाद (1798 ई. एवं 1800 ई.) — प्रथम राज्य।
- मैसूर (1799 ई.) — चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू की मृत्यु के बाद।
- तंजौर (अक्टूबर 1799 ई.)
- अवध (नवंबर 1801 ई.) — आधा राज्य कंपनी को सौंपना पड़ा।
- पेशवा (दिसंबर 1802 ई.) — बेसिन की संधि के द्वारा।
- भोंसले (दिसंबर 1803 ई.) — देवगाँव की संधि द्वारा।
- सिंधिया (फरवरी 1804 ई.) — सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि द्वारा।
8. अन्य राज्य
जोधपुर, जयपुर, मचेड़ी, बूंदी और भरतपुर।
प्रमुख युद्ध एवं विलय
- चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.): 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुआ; मैसूर पर सहायक संधि थोप दी गई।
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805 ई.): पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा बेसिन की संधि स्वीकार करने के बाद सिंधिया और भोंसले ने युद्ध छेड़ा, किंतु वे पराजित हुए और उन्होंने सहायक संधियाँ स्वीकार कीं।
- तंजौर, सूरत (1800) और कर्नाटक (1801) के प्रशासन का कंपनी द्वारा सीधे अधिग्रहण कर लिया गया।
फोर्ट विलियम कॉलेज एवं अन्य सुधार
- फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता (1800 ई.):
- असैनिक अधिकारियों (आईसीएस/सिविल सर्वेंट्स) को भारतीय भाषाओं, कानूनों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली का प्रशिक्षण देने के लिए वेलेजली ने 1800 में इसकी स्थापना की।
- (1802 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश पर इसे बंद कर दिया गया और 1806 से इंग्लैंड के हेलीबरी कॉलेज में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई।)
- प्रेस पर नियंत्रण (Censorship of Press Act - 1799 ई.): नेपोलियन के आक्रमण के भय और फ्रांसीसी षड्यंत्रों को रोकने के लिए समाचार पत्रों पर कठोर सेंसरशिप लागू की गई, जिसके तहत संपादक और मुद्रक का नाम छापना तथा सरकारी पूर्व-सेंसरशिप अनिवार्य कर दी गई।
7. लॉर्ड कॉर्नवालिस का दूसरा कार्यकाल (1805 ई.)
- अत्यधिक खर्चीले युद्धों के कारण जब बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने वेलेजली को वापस बुला लिया, तो कॉर्नवालिस को पुनः जुलाई 1805 में भारत भेजा गया ताकि वह शांति स्थापित कर सके।
- किंतु भारत पहुँचने के कुछ ही माह बाद अस्वस्थता के कारण 5 अक्टूबर 1805 को गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में कॉर्नवालिस की मृत्यु हो गई, जहाँ आज भी उसका मकबरा/समाधि स्थित है।
⚡ One-Liner Facts
- द्वैध शासन: रॉबर्ट क्लाइव — 1765 से 1772 ई.
- इलाहाबाद की पहली संधि: 12 अगस्त 1765 ई.
- भारत में कंपनी के अधीन प्रथम गवर्नर जनरल: वारेन हेस्टिंग्स।
- रेग्युलेटिंग एक्ट: 1773 ई.
- कलकत्ता उच्चतम न्यायालय: 1774 ई.
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर एलिजा इम्पे।
- नंदकुमार प्रकरण: 1775 ई.
- कलकत्ता मदरसा: 1781 ई.
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल: 1784 ई.
- पिट्स इंडिया एक्ट: 1784 ई.
- कॉर्नवालिस कोड: 1793 ई.
- दारोगा प्रणाली: 1792 ई.
- स्थायी बंदोबस्त: 22 मार्च 1793 ई.
- सहायक संधि का प्रमुख विस्तार: लॉर्ड वेलेजली।
- फोर्ट विलियम कॉलेज: 1800 ई.
- कॉर्नवालिस की मृत्यु: 5 अक्टूबर 1805 ई., गाजीपुर।
📌 Quick Facts — परीक्षा से पहले एक नजर
| व्यक्ति/घटना | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| रॉबर्ट क्लाइव | द्वैध शासन, उप-दीवान, भारतीय मानचित्रण की शुरुआत |
| वारेन हेस्टिंग्स | प्रथम गवर्नर जनरल, द्वैध शासन का अंत, न्यायिक व राजस्व सुधार |
| सर जॉन मैकफरसन | 1785–1786 ई. — कार्यवाहक/अस्थायी गवर्नर जनरल |
| लॉर्ड कॉर्नवालिस | सिविल सेवा सुधार, कॉर्नवालिस कोड, दारोगा प्रणाली, स्थायी बंदोबस्त |
| सर जॉन शोर | अहस्तक्षेप की नीति, खारदा का युद्ध |
| लॉर्ड वेलेजली | सहायक संधि, साम्राज्य विस्तार, फोर्ट विलियम कॉलेज |
🧠 याद रखने की छोटी ट्रिक
क्लाइव → हेस्टिंग्स → मैकफरसन → कॉर्नवालिस → शोर → वेलेजली → कॉर्नवालिस
इसी क्रम में 1757 से 1805 ई. के बीच कंपनी के अधीन प्रमुख गवर्नर/गवर्नर जनरल को याद किया जा सकता है।
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Attempt Quiz →निष्कर्ष
1757 से 1805 ई. का यह काल ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक, न्यायिक, राजस्व, सैन्य और साम्राज्यवादी विस्तार को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रॉबर्ट क्लाइव के द्वैध शासन से लेकर वारेन हेस्टिंग्स के प्रशासनिक एवं न्यायिक सुधार, कॉर्नवालिस के स्थायी बंदोबस्त तथा वेलेजली की सहायक संधि तक, इस पूरे काल ने भारत में ब्रिटिश सत्ता के संस्थागत विस्तार की आधारभूमि तैयार की।
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